सोमवार, 19 अक्टूबर 2026
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मुजफ्फरनगर में ‘दंगों’ के पोस्टर किसने लगाए? 13 साल बाद फिर क्यों मचा बवाल
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मुजफ्फरनगर में ‘दंगों’ के पोस्टर किसने लगाए? 13 साल बाद फिर क्यों मचा बवाल

उत्तर प्रदेश के सहारनपुर और लखनऊ में मुजफ्फरनगर दंगों की बरसी पर लगे पोस्टरों ने सूबे की सियासत में नया भूचाल ला दिया है। पोस्टरों में समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव को सीधे तौर पर निशाने पर लिया गया है, जिससे सपा, कांग्रेस और बीजेपी आमने-सामने आ गए हैं।

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उत्तर प्रदेश के सहारनपुर और लखनऊ में मुजफ्फरनगर दंगों की बरसी पर लगे पोस्टरों ने सूबे की सियासत में नया भूचाल ला दिया है। 'न भूले थे, न भूले हैं, न भूलेंगे' लिखे इन पोस्टरों में समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव को निशाने पर लिया गया है, जिसके बाद सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है।

इन पोस्टरों के सामने आने से राज्य में एक नया राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया है, जहां सपा और कांग्रेस इसे बीजेपी की साजिश बता रहे हैं, वहीं एनडीए नेताओं का कहना है कि यह सच्चाई को याद दिलाने का जरिया है।

मुजफ्फरनगर दंगों के पोस्टर और राजनीतिक निशाना

उत्तर प्रदेश में मुजफ्फरनगर दंगों की बरसी पर सहारनपुर और लखनऊ में बड़े पैमाने पर पोस्टर लगाए गए हैं। इन पोस्टरों के जरिए सीधे तौर पर समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव को निशाने पर लिया गया है।

  • पोस्टरों पर 2013 के मुजफ्फरनगर दंगों का जिक्र किया गया है।
  • इनमें अखिलेश यादव की तस्वीर के साथ पुरानी घटनाओं और अखबारों की कटिंग्स का इस्तेमाल किया गया है।
  • पोस्टर लगने के बाद से राज्य की सियासत में एक बार फिर सांप्रदायिक और राजनीतिक तनाव की सुगबुगाहट तेज हो गई है।

विपक्ष और सत्ता पक्ष की प्रतिक्रिया

पोस्टर सामने आने के बाद कांग्रेस और समाजवादी पार्टी ने भारतीय जनता पार्टी पर तीखा हमला बोला है। कांग्रेस नेताओं का आरोप है कि यह बीजेपी के फ्रिंज एलिमेंट्स और समर्थकों का काम है, जो बड़े नेताओं को बदनाम करने के लिए ऐसे अभियान चला रहे हैं।

  • कांग्रेस का आरोप है कि बीजेपी ऐसे पोस्टरों के जरिए ध्रुवीकरण की राजनीति कर रही है।
  • सपा नेताओं का कहना है कि जनता आने वाले चुनावों में बीजेपी को इसका करारा जवाब देगी।
  • दूसरी ओर, एनडीए नेताओं का तर्क है कि पोस्टर लगाने वाले सही कह रहे हैं और उस काले दिन को कोई नहीं भूला सकता।

2013 के मुजफ्फरनगर दंगे: एक काला अध्याय

7 सितंबर 2013 को मुजफ्फरनगर और उसके आसपास के इलाकों में भीषण सांप्रदायिक हिंसा भड़क उठी थी। इस घटना ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति और सामाजिक ताने-बाने पर गहरा असर डाला था।

  • सरकारी आंकड़ों के अनुसार, इस हिंसा और उसके बाद की घटनाओं में 60 से अधिक लोगों की जान गई थी।
  • 40 हजार से अधिक लोगों को अपना घर छोड़कर विस्थापित होना पड़ा था।
  • घटना की बरसी पर हर साल राजनीतिक दलों के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर देखने को मिलता है।
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