शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती महाराज ने एक साक्षात्कार के दौरान हिंदू धर्म, मनुस्मृति और देश के राजनीतिक नेतृत्व को लेकर कई तीखे और महत्वपूर्ण विचार साझा किए हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि वे किसे असली हिंदू मानते हैं और किसे नकली, साथ ही उन्होंने वेदों और शास्त्रों की प्रामाणिकता पर जोर दिया।
पत्रकार शाजिया निसार के साथ बातचीत में उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS), राजनेताओं और संविधान के साथ मनुस्मृति के समन्वय जैसे गंभीर मुद्दों पर अपने विचार खुलकर रखे।
असली और नकली हिंदू की परिभाषा
शंकराचार्य जी ने असली हिंदू की पहचान बताते हुए कहा कि जो व्यक्ति वेद, शास्त्र और गुरु के निर्देशों के अनुसार अपने जीवन को आगे बढ़ाता है, वही सच्चा हिंदू है। उनके अनुसार:
- जो वेद-शास्त्रों और गुरुओं को नहीं मानता, वह यदि खुद को हिंदू कहता भी है तो वह नकली हिंदू है।
- उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि RSS वेदों, शास्त्रों और जीवित गुरु परंपरा को नहीं मानती।
- उन्होंने संघ की गुरु पूर्णिमा पद्धति की आलोचना करते हुए कहा कि एक डंडे या ध्वज को गुरु मानकर प्रणाम करना और दक्षिणा चढ़ाना असली गुरु परंपरा नहीं है।
गोहत्या और देश के नेतृत्व पर उठाए सवाल
जब उनसे पूछा गया कि क्या देश में आज तक कोई हिंदू प्रधानमंत्री नहीं बना, तो उन्होंने गोहत्या के मुद्दे को सामने रखा। उन्होंने कहा कि कोई भी सच्चा हिंदू किसी भी सूरत में गाय की हत्या को स्वीकार नहीं कर सकता।
शंकराचार्य ने तर्क दिया कि आजादी के 78 वर्षों बाद भी यदि देश में गोहत्या जारी है, तो इसका स्पष्ट अर्थ है कि सच्चा हिंदू अभी तक देश का प्रधानमंत्री नहीं बना है। जिस दिन कोई असली हिंदू भारत का प्रधानमंत्री बनेगा, उस दिन देश में गोहत्या पूरी तरह बंद हो जाएगी।
मनुस्मृति और संविधान की तुलना
मनुस्मृति के संदर्भ में बात करते हुए शंकराचार्य ने कहा कि यह हमारा धर्मशास्त्र है, जिसमें जीवन के नियम बताए गए हैं। उन्होंने कहा कि उनका जीवन मनुस्मृति के अनुसार चलता है, जैसे संन्यासियों का गेरुआ पहनना, कथा वाचन और श्रोताओं की व्यवस्था सब धर्मशास्त्रों के अनुकूल है।
- संविधान केवल देश की भौगोलिक सीमाओं के भीतर लागू होता है, जबकि मनुस्मृति परलोक और संपूर्ण ब्रह्मांडीय व्यवस्था की बात करती है।
- वे संविधान को केवल उसी सीमा तक स्वीकार करते हैं जहाँ तक वह मनुस्मृति का विरोध नहीं करता।
- उन्होंने कहा कि भारतीय संविधान भी नागरिकों को उनके पर्सनल लॉ और धार्मिक मान्यताओं के अनुसार जीने की छूट देता है।
मनुस्मृति में महिलाओं के स्थान पर स्पष्टीकरण
मनुस्मृति को महिला विरोधी कहे जाने के आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए शंकराचार्य ने कहा कि इस ग्रंथ ने महिलाओं को सर्वोच्च सम्मान दिया है। उन्होंने प्रसिद्ध श्लोक 'यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः' का हवाला देते हुए कहा कि मनुस्मृति ने स्त्री को पुरुष का 'आधा अंग' माना है।
उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री की पत्नियों को बिना चुनाव लड़े जो संवैधानिक और आधिकारिक सम्मान (जैसे राष्ट्रपति भवन में रहना या प्रथम महिला का दर्जा) मिलता है, वह अवधारणा भी मनुस्मृति के अर्धांगिनी सिद्धांत से ही प्रेरित है। इसके अतिरिक्त, 'न स्त्री स्वातन्त्र्यमर्हति' वाले श्लोक पर उन्होंने राहुल गांधी और कांग्रेसियों को घेरते हुए कहा कि इसका अर्थ स्वतंत्रता छीनना नहीं, बल्कि हर उम्र में (बचपन में पिता, युवावस्था में पति और वृद्धावस्था में पुत्र द्वारा) स्त्री को सुरक्षा व संरक्षण देना है, और मनुस्मृति ने पुरुषों को स्त्रियों का संरक्षक और बॉडीगार्ड बनाया है।


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