ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती महाराज ने एक साक्षात्कार में मनुस्मृति, भारतीय संविधान और महिलाओं के अधिकारों पर खुलकर अपनी राय रखी है। उन्होंने कहा कि मनुस्मृति सनातन धर्मावलंबियों का मूल धर्मशास्त्र है, जिसके अनुसार जीवन के आचरण, नियम और व्यवस्थाएं तय होती हैं।
शंकराचार्य ने स्पष्ट किया कि संविधान केवल एक देश की भौगोलिक सीमा तक सीमित रहता है, जबकि धर्मशास्त्र पूरे ब्रह्मांड और परलोक तक के नियमों की व्याख्या करता है।
'मनुस्मृति पूरे ब्रह्मांड पर लागू, संविधान केवल भारत तक'
संविधान और धर्मशास्त्र की तुलना करते हुए शंकराचार्य ने कहा कि संविधान सिर्फ एक देश के भीतर लागू होता है, जबकि मनुस्मृति तीनों लोकों और पूरे ब्रह्मांड के लिए है।
- शंकराचार्य के अनुसार, संविधान परलोक और मृत्यु के बाद के जीवन की बात नहीं करता, जबकि मनुस्मृति परलोक की भी व्यवस्था बताती है।
- उन्होंने कहा कि किसी दूसरे देश में जाने पर भारत का संविधान काम नहीं करता, लेकिन मनुस्मृति के अनुसार जीवन जीने वाला व्यक्ति कहीं भी रहे, वह उसी धर्म का पालन करता है।
- उन्होंने यह भी कहा कि वे संविधान को उतना ही मानते हैं, जितना वह मनुस्मृति के विरुद्ध न हो। यदि संविधान मनुस्मृति का विरोध करेगा, तो वे उसका विरोध करेंगे।
कड़े दंड के प्रावधानों का किया समर्थन
मनुस्मृति में वर्णित कठोर दंड के सवाल पर शंकराचार्य ने कहा कि समाज में अनुशासन बनाए रखने के लिए कठोर दंड अनिवार्य है।
उन्होंने कहा कि दंड के भय से ही प्रजा नियंत्रित और अनुशासित रहती है। यदि दंड कड़ा नहीं होगा तो समाज में मनमानापन, भ्रष्टाचार, अन्याय और अत्याचार फैलेगा। विश्व में जिन देशों में कड़े दंड के नियम हैं, वहां प्रजा अधिक अनुशासित है।
'मनुस्मृति महिला विरोधी नहीं, महिलाओं को दिया सर्वोच्च सम्मान'
मनुस्मृति को महिला विरोधी बताए जाने वाले तर्कों को खारिज करते हुए शंकराचार्य ने कहा कि इस धर्मशास्त्र ने स्त्री को पुरुष का 'आधा अंग' माना है और उसे जो सम्मान दिया है, वह किसी अन्य ग्रंथ में नहीं मिलता।
- उन्होंने उदाहरण दिया कि देश का राष्ट्रपति चुनाव लड़कर जीतता है, लेकिन उसकी पत्नी बिना चुनाव लड़े 'प्रथम महिला' बनकर राष्ट्रपति भवन में रहती है; यह अधिकार मनुस्मृति की इसी भावना से प्रेरित है।
- इसी प्रकार प्रतिभा पाटिल जब राष्ट्रपति बनीं, तो उनके पति देवीसिंह पाटिल भी उनके साथ राष्ट्रपति भवन में रहे।
- 'यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः' का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि जहां स्त्रियों का सम्मान होता है, वहां देवता वास करते हैं।
राहुल गांधी और कांग्रेस पर साधा निशाना
शंकराचार्य ने राहुल गांधी द्वारा मनुस्मृति के श्लोक को लेकर की जाने वाली आलोचना पर कड़ा ऐतराज जताया। उन्होंने कहा कि श्लोक 'न स्त्री स्वातन्त्र्यमर्हति' का संदर्भ स्त्री की सुरक्षा और संरक्षण से जुड़ा है, न कि उसकी स्वतंत्रता छीनने से।
उन्होंने कहा कि बच्ची होने पर पिता, युवावस्था में पति और वृद्धावस्था में पुत्र को स्त्री की रक्षा का दायित्व दिया गया है, यानी पुरुषों को स्त्रियों का संरक्षक और बॉडीगार्ड बनाया गया है। उन्होंने सवाल किया कि क्या कांग्रेसी अपनी बेटियों के पैदा होते ही उनकी सुरक्षा करना छोड़ देते हैं? उन्होंने राहुल गांधी द्वारा सोनिया गांधी के इलाज के दौरान अस्पताल में साथ खड़े रहने का जिक्र करते हुए कहा कि उनके आचरण में भी वही मनुस्मृति दिखती है जिसकी वे मंचों से आलोचना करते हैं।


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