सोमवार, 19 अक्टूबर 2026
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SIR में Form 6 पर चुनाव आयोग में क्यों मचा था घमासान? अतिरिक्त डिक्लेरेशन हटने के बाद खड़े हुए गंभीर सवाल
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SIR में Form 6 पर चुनाव आयोग में क्यों मचा था घमासान? अतिरिक्त डिक्लेरेशन हटने के बाद खड़े हुए गंभीर सवाल

विशेष सारांश संशोधन (SIR) के दौरान ऑनलाइन फॉर्म 6 में जोड़े गए अतिरिक्त डिक्लेरेशन को लेकर चुनाव आयोग के भीतर मतभेद सामने आए थे। चुनाव आयुक्तों की आपत्ति के बाद अब कई राज्यों से इस डिक्लेरेशन को हटा दिया गया है, जिससे चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल उठ रहे हैं।

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विशेष सारांश संशोधन (SIR) के दौरान नए मतदाताओं के पंजीकरण के लिए उपयोग किए जाने वाले फॉर्म 6 में किए गए बदलावों को लेकर विवाद गहरा गया है। चुनाव आयोग के दो चुनाव आयुक्तों द्वारा नियमों के खिलाफ बताकर आपत्ति दर्ज कराने के बाद, अब आयोग ने उन राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में ऑनलाइन फॉर्म 6 से इस अतिरिक्त डिक्लेरेशन को हटा दिया है जहां SIR की प्रक्रिया पूरी हो चुकी है।

डिक्लेरेशन हटने के बाद अब यह बड़ा सवाल उठ खड़ा हुआ है कि यदि फॉर्म में बदलाव सही था तो उसे वापस क्यों हटाया गया, और यदि यह नियमों के खिलाफ था तो महीनों तक पोर्टल पर लागू किसके आदेश पर रहा।

ऑनलाइन फॉर्म 6 में क्या जोड़ा गया था?

फॉर्म 6 कोई सामान्य ऑनलाइन फॉर्म नहीं बल्कि एक वैधानिक (Statutory) फॉर्म है, जिसके जरिए नया मतदाता अपना नाम वोटर लिस्ट में जुड़वाता है। SIR के दौरान चुनाव आयोग के ऑनलाइन पोर्टल पर फॉर्म 6 में एक अतिरिक्त घोषणा (SIR Declaration) जोड़ दी गई थी।

इस अतिरिक्त घोषणा के तहत नए आवेदक से निम्नलिखित जानकारियां मांगी जा रही थीं:

  • क्या आवेदक का नाम पिछली SIR वोटर लिस्ट में मौजूद है?
  • क्या उसके माता-पिता या दादा-दादी का नाम पिछली SIR वोटर लिस्ट में दर्ज है?
  • यदि हां, तो विधानसभा क्षेत्र, पोलिंग बूथ/पार्ट नंबर और पिछली SIR का सीरियल नंबर जैसी विस्तृत जानकारी।

इस व्यवस्था के चलते फॉर्म 6 के दो रूप सामने आ गए थे—एक डाउनलोड करने योग्य वैधानिक फॉर्म जिसमें यह डिक्लेरेशन नहीं था, और दूसरा ऑनलाइन फॉर्म जहां इसे भरना अनिवार्य जैसा बना दिया गया था।

चुनाव आयुक्तों की आपत्ति और आंतरिक मतभेद

इस बदलाव पर चुनाव आयुक्त विवेक जोशी ने कड़ी आपत्ति दर्ज कराई थी। उनका स्पष्ट कहना था कि फॉर्म 6 एक कानूनी व वैधानिक फॉर्म है और चुनावी नियमों में विधिवत संशोधन किए बिना इसे इस तरह मनमाने ढंग से नहीं बदला जा सकता।

चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू ने भी इस आपत्ति से सहमति जताई थी और पोर्टल से इस व्यवस्था को हटाने की बात कही थी। इस घटनाक्रम ने यह उजागर किया कि नए मतदाताओं के पंजीकरण, वोटर डिलिशन और इलेक्टोरल रोल सिस्टम को लेकर आयोग के शीर्ष स्तर पर गंभीर मतभेद मौजूद थे।

नियम बनाम फैमिली मैपिंग का सवाल

संविधान और चुनाव कानूनों के मुताबिक किसी भी नागरिक के वोटर बनने के लिए कुछ मूलभूत पात्रता शर्तें तय हैं:

  • व्यक्ति भारत का नागरिक हो।
  • उसने निर्धारित आयु सीमा पूरी कर ली हो।
  • वह संबंधित निर्वाचन क्षेत्र का सामान्य निवासी (Ordinary Resident) हो।

ऐसे में पहली बार वोट देने वाले युवाओं के लिए माता-पिता या दादा-दादी के पुराने रिकॉर्ड की 'फैमिली मैपिंग' मांगना प्रक्रिया को जटिल बना रहा था, खासकर उन लोगों के लिए जिनके पूर्वजों के नाम पिछली सूचियों में आसानी से उपलब्ध नहीं थे।

आयोग का नया फैसला और अनुत्तरित सवाल

ताजा घटनाक्रम के अनुसार, चुनाव आयोग ने उन सभी राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों में ऑनलाइन फॉर्म 6 से अतिरिक्त SIR डिक्लेरेशन हटा दिया है जहां संशोधन पूरा हो चुका है, जबकि जहां प्रक्रिया जारी है वहां यह अभी भी दिख रहा है। हालांकि आयोग ने सार्वजनिक तौर पर यह स्वीकार नहीं किया है कि पिछला बदलाव गलत था।

अब मुख्य सवाल यह बना हुआ है कि जब वैधानिक फॉर्म 6 ही अंततः लागू होना था, तो बीच में यह अतिरिक्त शर्त किसके आदेश से जोड़ी गई थी और संवेदनशील मतदाता सूची के नियमों को बदलने का अधिकार वास्तव में किसके पास है।

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