सोमवार, 19 अक्टूबर 2026
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SIR का फैसला आखिर किसने लिया? CEC ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सुप्रीम कोर्ट में उठा सवाल
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SIR का फैसला आखिर किसने लिया? CEC ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सुप्रीम कोर्ट में उठा सवाल

चुनाव आयोग द्वारा वोटर लिस्ट में किए गए एसआईआर (SIR) को लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की गई है। कोर्ट में सवाल उठाया गया है कि क्या यह फैसला तीनों चुनाव आयुक्तों की सर्वसम्मति या तय कानूनी प्रक्रिया से लिया गया था।

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देशभर की वोटर लिस्ट को खंगालने वाली स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) प्रक्रिया के वजूद पर अब सुप्रीम कोर्ट में सवाल उठ गया है। मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट में याचिकाकर्ता राकेश कुमार सिंह की ओर से सीनियर एडवोकेट विकास सिंह ने जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन जजों की बेंच के सामने यह मामला उठाया। सवाल यह खड़ा किया गया है कि निर्वाचन आयोग का एसआईआर का फैसला आखिरकार किसने लिया था और क्या इसमें तय कानूनी प्रक्रिया का पालन हुआ था।

चीफ जस्टिस की बेंच ने इस याचिका पर सुनवाई के लिए अगले हफ्ते का समय तय किया है। अदालत में यह तर्क रखा गया है कि चुनाव आयोग एक बहु-सदस्यीय संस्था है, जिसमें मुख्य चुनाव आयुक्त के अलावा दो चुनाव आयुक्त भी शामिल हैं। ऐसे में यदि आयोग के निर्णयों में आंतरिक असहमति थी, तो क्या यह फैसला कानूनी रूप से वैध माना जा सकता है।

सुप्रीम कोर्ट में क्या दी गईं दलीलें?

वरिष्ठ वकील विकास सिंह ने अदालत के समक्ष कई महत्वपूर्ण बिंदु रखे:

  • संविधान के आर्टिकल 324 और मुख्य चुनाव आयुक्त एवं अन्य चुनाव आयुक्त अधिनियम, 2023 के तहत चुनाव आयोग एक बहु-सदस्यीय संस्था है।
  • अधिनियम की धारा 18 के अनुसार आयोग का कामकाज जहां तक संभव हो सर्वसम्मति (unanimous) से होना चाहिए।
  • यदि आयुक्तों के बीच मतभेद हो, तो निर्णय बहुमत (majority) के आधार पर लिया जाना आवश्यक है।
  • याचिकाकर्ता ने मांग की है कि आयोग के ओरिजिनल रिकॉर्ड्स और डिसीजन मेकिंग फाइल्स मंगाई जाएं ताकि पता चल सके कि क्या यह फैसला तय कानूनी प्रक्रिया से लिया गया था।

10 महीनों में दर्ज हुईं 14 आपत्तियां

इंडियन एक्सप्रेस की एक जांच रिपोर्ट के हवाले से बताया गया है कि पिछले 10 महीनों में चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने आयोग के विभिन्न फैसलों पर कम से कम 14 बार अपनी आपत्तियां दर्ज कराई थीं।

रिपोर्ट के अनुसार, कुछ मामलों में आयुक्तों ने कहा कि फैसले उनकी जानकारी या सिफारिश के बिना लिए गए थे। ये आपत्तियां निम्नलिखित विषयों से जुड़ी थीं:

  • नए वोटर जोड़ने और नाम हटाने की प्रक्रिया।
  • फॉर्म-6 में किए गए बदलाव।
  • वोटर डेटाबेस और आईटी सिस्टम का कंट्रोल।
  • एसआईआर से जुड़े अलग-अलग प्रशासनिक फैसले।

फॉर्म-6 और नियमों में संशोधन का विवाद

विवाद का एक बड़ा हिस्सा फॉर्म-6 से जुड़ा है, जिसका उपयोग नए मतदाताओं के नाम जोड़ने के लिए किया जाता है। एसआईआर के दौरान इसमें पिछली एसआईआर से संबंधित डिक्लेरेशन मांगी गई थी और आवेदकों से माता-पिता या दादा-दादी के पुराने चुनावी विवरण मांगे गए थे।

आयुक्त विवेक जोशी और सुखबीर सिंह संधू ने सवाल उठाया कि 'रजिस्ट्रेशन ऑफ इलेक्टर्स रूल्स, 1960' को बदले बिना फॉर्म-6 में यह बदलाव कैसे किया जा सकता है। संधू ने इसे अनाधिकृत और गैर-कानूनी बताते हुए हटाने की मांग की थी। नियमों के तहत यदि किसी वैधानिक फॉर्म में बदलाव करना हो, तो केंद्र सरकार और कानून मंत्रालय के जरिए नियमों में संशोधन की अधिसूचना जारी करनी होती है।

डेटाबेस सेंट्रलाइजेशन और चुनाव आयोग का पक्ष

मामले में वोटर डेटाबेस और आईटी सिस्टम के सेंट्रलाइजेशन पर भी सवाल उठाए गए हैं। गोवा का उदाहरण देते हुए बताया गया कि वहां 97 वोटरों को स्थानीय इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर्स (ERO) ने पात्र पाया, लेकिन केंद्रीय ईसीआई-नेट (ECINet) सॉफ्टवेयर की दिक्कतों के कारण वे नाम सूची में शामिल नहीं हो सके। इससे यह सवाल उठा कि वास्तविक निर्णय लेने का अधिकार किसके पास है—स्थानीय अधिकारी या केंद्रीय सॉफ्टवेयर?

दूसरी ओर, चुनाव आयोग ने इस व्याख्या को खारिज किया है। आयोग का कहना है कि संस्थागत विचार-विमर्श के दौरान आयुक्तों के अलग-अलग विचार हो सकते हैं, लेकिन अंतिम फैसले सर्वसम्मति से लिए गए थे। कुछ पत्रों को लेकर आयोग ने स्पष्ट किया कि वे किसी अधिकारी के डेपुटेशन से जुड़े थे, नीति या आईटी डिवीजन से नहीं। फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने कोई फैसला नहीं सुनाया है और मामले की सुनवाई अगले हफ्ते होगी।

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