सोमवार, 19 अक्टूबर 2026
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SIR में वोटर्स के नाम कटने पर बॉम्बे हाईकोर्ट सख्त, चुनाव आयोग से पूछा- सॉफ्टवेयर के आधार पर नाम कैसे हटा?
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SIR में वोटर्स के नाम कटने पर बॉम्बे हाईकोर्ट सख्त, चुनाव आयोग से पूछा- सॉफ्टवेयर के आधार पर नाम कैसे हटा?

स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के दौरान बिना सुनवाई मतदाताओं के नाम ड्राफ्ट लिस्ट से बाहर होने पर बॉम्बे हाईकोर्ट की गोवा बेंच ने कड़ा रुख अपनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कोई भी प्रशासनिक सॉफ्टवेयर वैधानिक कानून को ओवरराइड नहीं कर सकता।

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स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) को लेकर बॉम्बे हाईकोर्ट की गोवा बेंच ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और सॉफ्टवेयर व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। कोर्ट ने एक मामले की सुनवाई करते हुए पूछा कि जो नागरिक पहले से पंजीकृत मतदाता थे, वे सिस्टम के लिए अचानक नए वोटर कैसे बन गए और किस कानून के तहत बिना सुनवाई उनका नाम हटाया गया।

अदालत ने सख्त लहजे में कहा कि प्रशासनिक सॉफ्टवेयर वैधानिक कानून (Statutory Law) से ऊपर नहीं हो सकता। यह मामला केवल कुछ मतदाताओं का नहीं है, बल्कि चुनाव प्रक्रिया में तकनीकी प्रणालियों की भूमिका और मतदाताओं के अधिकारों से जुड़ा एक बड़ा कानूनी सवाल है।

गोवा का मामला: एड्रेस बदलने पर सिस्टम से गायब हुआ नाम

यह पूरा विवाद गोवा की सांताक्रूज विधानसभा सीट से जुड़े एक परिवार की याचिका पर सामने आया। परिवार के छह सदस्य पहले से ही वैध और पंजीकृत मतदाता थे। उसी विधानसभा क्षेत्र में अपना घर बदलने के बाद उन्होंने पता अपडेट कराने के लिए 'फॉर्म 8' जमा किया था, न कि नए वोटर के तौर पर 'फॉर्म 6'।

याचिकाकर्ताओं के अनुसार, जब उनका आवेदन प्रोसेस किया गया तो ERONET सिस्टम में उनका ईपीआईसी (EPIC) नंबर नहीं मिला। इसके बाद उनका नाम ड्राफ्ट रोल से गायब हो गया और अधिकारियों ने उन्हें नया वोटर बनने के लिए 'फॉर्म 6' भरने की सलाह दी।

हाईकोर्ट की तीखी टिप्पणी: सॉफ्टवेयर अधिकारियों का फैसला तय नहीं कर सकता

सुनवाई के दौरान जब अधिकारियों ने सिस्टम की तकनीकी मजबूरियों का हवाला दिया, तो हाईकोर्ट की बेंच ने कहा कि वे इस स्थिति से बेहद विचलित (perturbed) हैं। कोर्ट ने महत्वपूर्ण कानूनी पहलू रेखांकित किए:

  • रिप्रजेंटेशन ऑफ द पीपल एक्ट (RPA) का वह प्रावधान दिखाया जाए जिसके तहत बिना सुनवाई का मौका दिए किसी मतदाता का नाम हटाया जा सकता है।
  • SIR की ड्राफ्ट रोल अपने आप में किसी मौजूदा वोटर का नाम हटाने का कानूनी आधार नहीं बन सकती।
  • अधिकारियों को सिस्टम पर पूरी तरह निर्भर होने के बजाय जमीनी स्तर पर स्वतंत्र जांच करनी होगी कि वोटर वास्तव में शिफ्ट हुआ है या नहीं।
  • कोई भी प्रशासनिक सॉफ्टवेयर वैधानिक प्रक्रिया को दरकिनार नहीं कर सकता।

दिल्ली का आंकड़ा: एसआईआर के व्यापक पैमाने की तस्वीर

गोवा के इस मामले ने देश भर में चल रही एसआईआर प्रक्रिया पर ध्यान खींचा है। दिल्ली के आंकड़े इस प्रक्रिया के विशाल पैमाने को दर्शाते हैं:

  • शुरुआती मतदाता: दिल्ली में एसआईआर शुरू होने से पहले मतदाताओं की संख्या करीब 1.45 करोड़ थी।
  • ड्राफ्ट रोल में नाम: 31 अगस्त को जारी ड्राफ्ट मतदाता सूची में यह संख्या घटकर करीब 97.5 लाख रह गई।
  • बाहर हुए पुराने नाम: करीब 47.6 लाख पुराने नाम ड्राफ्ट में शामिल नहीं हुए, जिन्हें एब्सेंट, शिफ्टेड, डेड या डुप्लीकेट (ASDD) श्रेणियों में रखा गया।
  • नोटिस जारी: ड्राफ्ट में शामिल नामों में से भी करीब 33.13 लाख मतदाताओं को अनमैप्ड रिकॉर्ड या विसंगतियों के कारण नोटिस जारी किए गए हैं।
  • दावों की रफ्तार: 28 सितंबर तक दिल्ली में करीब 1.34 लाख फॉर्म 6 आवेदन ही प्राप्त हुए थे।

चुनाव आयोग के कदम और ईसीआईनेट रिव्यू कमेटी

गोवा में इससे पहले 97 छूटे हुए मतदाताओं का मामला सामने आने पर मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने बीएलओ को घर-घर जाकर फॉर्म कलेक्ट करने के निर्देश दिए थे, जिसके बाद 81 लोगों के फॉर्म भरवाए गए।

इसके साथ ही चुनाव आयोग ने 26 सितंबर की बैठक में ECINet की एक रिव्यू कमेटी गठित करने का फैसला किया है। इस कमेटी का नेतृत्व सीनियर डिप्टी इलेक्शन कमिश्नर करेंगे और इसमें आईआईटी या आईआईआईटी के स्वतंत्र विशेषज्ञ शामिल होंगे। यह समिति यह जांच करेगी कि सॉफ्टवेयर के प्रावधान कानूनों और नियमों के अनुरूप हैं या नहीं, तथा फील्ड अफसरों को काम करने के लिए अधिक लचीलापन दिया जा सके।

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