राजधानी दिल्ली में आयोजित एक संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस में छात्र संगठनों, कार्यकर्ताओं और वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने वोटर लिस्ट में कथित बड़े पैमाने की धांधली और उसके खिलाफ आवाज उठाने वालों पर हो रहे पुलिसिया दमन को लेकर केंद्र सरकार और चुनाव आयोग पर गंभीर आरोप लगाए। प्रेस कॉन्फ्रेंस की शुरुआत में कुछ लोगों द्वारा हंगामा करने की कोशिश की गई, जिसके बाद आयोजकों और प्रेस क्लब की टीम से व्यवधान डालने वालों को बाहर निकालने का अनुरोध किया गया।
वक्ताओं ने आरोप लगाया कि देश भर में नागरिकों के मताधिकार को छीना जा रहा है और इसके खिलाफ शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने वाले छात्रों, पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को जेल भेजा जा रहा है।
पत्रकारों और प्रदर्शनकारियों पर दमन का आरोप
प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए नेहा ने कहा कि दिल्ली की सड़कों पर जनता और पत्रकारों के साथ पुलिस की बर्बरता देखी गई है। उन्होंने आरोप लगाया कि कई स्वतंत्र मीडिया संस्थानों के पत्रकारों के पास प्रेस कार्ड होने के बावजूद उन्हें घंटों हिरासत में रखा गया और उनके कैमरे छीने गए।
- द कैरावन और द क्विंट के पत्रकारों को जबरन हिरासत में रखने और कैमरे जब्त करने का आरोप लगाया गया।
- एक महिला पत्रकार के साथ कथित बदसलूकी और शिकायत दर्ज कराने जाने पर उल्टे उसी पर एफआईआर दर्ज करने का मामला उठाया गया।
- छात्र कार्यकर्ता सौरव दास और आशुतोष रांका को पांच दिनों की न्यायिक हिरासत में भेजे जाने की निंदा की गई।
13 करोड़ वोट काटे जाने और चुनाव आयोग पर सवाल
कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के संस्थापक अभिजीत दिपके ने कहा कि इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट से चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े हुए हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को बचाने के लिए पूरी सरकारी मशीनरी लगा दी गई है।
दिपके ने दावा किया कि 2024 के चुनावों में जीत-हार का अंतर मात्र 2 प्रतिशत था, जबकि पिछले दो वर्षों में 13 करोड़ से अधिक वोटरों के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए हैं, जो कुल रजिस्टर्ड वोटरों का लगभग 14 प्रतिशत हिस्सा है। उन्होंने बेंगलुरु का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां ऐसे कई लोग मंच पर दस्तावेज लेकर उपस्थित हुए, जिन्हें चुनाव आयोग ने कागजों पर 'मृत' घोषित कर दिया था। इसके अलावा 10 अक्टूबर के शांतिपूर्ण प्रदर्शन को रोकने के लिए दिल्ली में मेट्रो स्टेशन, रेलवे और अन्य सेवाएं ठप करने तथा बाहरी राज्यों से सुरक्षा बल बुलाने पर भी सवाल उठाए गए।
एसआईआर और फॉर्म 6 के जरिए वोटरों को बाहर करने की साजिश: प्रशांत भूषण
वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने एसआईआर (स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन) प्रक्रिया में हुई धांधली का विस्तार से ब्योरा दिया। उन्होंने कहा कि चुनावी कानून की धज्जियां उड़ाते हुए स्थानीय इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर (ईआरओ) के बजाय दिल्ली में एक केंद्रीकृत आईटी सेल बनाकर नाम जोड़ने और हटाने का नियंत्रण अपने हाथ में ले लिया गया।
- शिफ्टेड वोटरों का मुद्दा: दिल्ली में 47 लाख नाम ड्राफ्ट रोल से हटाए गए, जिनमें से करीब 42 लाख को 'शिफ्टेड' बता दिया गया। फॉर्म में पुराना पता छपा होने से लोग उसे भर नहीं सके।
- फॉर्म 6 की शर्त: नाम दोबारा जुड़वाने के लिए नए वोटरों वाला फॉर्म 6 भरने को कहा गया, जिसमें यह घोषणा देनी होती है कि पहले कभी वोट नहीं दिया; झूठी घोषणा पर एक साल की जेल का प्रावधान है।
- लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी: दिल्ली में करीब 19 लाख लोगों को लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी के मनमाने नोटिस भेजे गए, जिनमें असंगत रूप से अल्पसंख्यक आबादी को निशाना बनाया गया।
शांतिपूर्ण प्रदर्शन का अधिकार और 'रेजीम चेंज' की मांग
प्रशांत भूषण ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन करना हर नागरिक का मौलिक अधिकार है और सरकार कोई चुनिंदा जगह तय करके इस अधिकार को सीमित नहीं कर सकती। उन्होंने कनॉट प्लेस में लाठी लेकर मारपीट करने वाले कथित भाजपा कार्यकर्ताओं को एक दिन में छोड़ देने और जंतर-मंतर पर तिरंगा फहराने वाले युवाओं को पांच दिन की हिरासत में भेजने को दोहरा रवैया बताया।
उन्होंने कहा कि छात्र संगठनों, किसान संगठनों, ट्रेड यूनियनों और सिविल सोसाइटी ने मिलकर चुनावी लोकतंत्र को बचाने की ठान ली है। प्रशांत भूषण ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि लोकतांत्रिक अधिकारों को कुचलने वाली इस तानाशाही सरकार को लोकतांत्रिक तरीके से बदलना यानी 'रेजीम चेंज' कराना हर नागरिक का अधिकार है और यह आंदोलन इसी दिशा में आगे बढ़ेगा।


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