दिल्ली के प्रेस क्लब में आयोजित एक संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान उस समय भारी हंगामा देखने को मिला जब वक्ताओं के संबोधन के बीच कुछ लोगों ने नारेबाजी और व्यवधान पैदा करने की कोशिश की। आयोजकों और छात्र नेताओं ने व्यवधान डालने वालों को बाहर करने की अपील करते हुए प्रेस वार्ता को आगे बढ़ाया। इस दौरान छात्र नेताओं के साथ वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने चुनाव आयोग की 'विशेष गहन पुनरीक्षण' (SIR) प्रक्रिया और दिल्ली समेत देशभर में बड़े पैमाने पर वोट काटे जाने को लेकर केंद्र सरकार को आड़े हाथों लिया।
प्रेस कॉन्फ्रेंस में हंगामे के बीच छात्र नेताओं का तीखा पलटवार
प्रेस कॉन्फ्रेंस की शुरुआत में ही व्यवधान पैदा होने पर छात्र नेता नेहा और कॉकरोच जनता पार्टी के संस्थापक अभिजीत दीपके ने प्रेस क्लब प्रबंधन से ऐसे तत्वों को बाहर निकालने का आग्रह किया। नेहा ने दिल्ली की सड़कों पर पिछले कई दिनों से जारी पुलिसिया दमन का जिक्र करते हुए कहा कि राज्य की मशीनरी जनता के अधिकारों को दबाने में लगी है। उन्होंने पत्रकार सुरक्षा का मुद्दा उठाते हुए कहा कि निष्पक्ष रिपोर्टिंग कर रहे पत्रकारों को हिरासत में लिया जा रहा है और कैमरे छीने जा रहे हैं।
नेहा ने रामधारी सिंह दिनकर की प्रसिद्ध रचना 'रश्मिरथी' की पंक्तियों को उद्धृत करते हुए कहा कि यह आंदोलन किसी एक व्यक्ति या दल का नहीं, बल्कि देश के आम नागरिकों के मताधिकार की रक्षा का है। उन्होंने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने की मांग दोहराई।
SIR के नाम पर वोट काटने और धांधली के गंभीर आरोप
कॉकरोच जनता पार्टी के संस्थापक अभिजीत दीपके ने 2024 के लोकसभा चुनावों के आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया कि चुनावी हार-जीत का अंतर महज 2 प्रतिशत के आसपास था, जबकि पिछले दो वर्षों में देश भर से करीब 13 करोड़ मतदाताओं के नाम काट दिए गए, जो कुल वोट शेयर का लगभग 14 प्रतिशत है।
- जीवित मतदाताओं को मृत घोषित करने का दावा: बेंगलुरु के एक कार्यक्रम का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि वहां ऐसे कई लोग मंच पर दस्तावेज लेकर पहुंचे जिन्हें चुनाव आयोग के रिकॉर्ड में मृत दिखाकर नाम काट दिए गए थे।
- शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों पर दमन: उन्होंने आरोप लगाया कि जंतर-मंतर पर तिरंगा फहराने गए आशुतोष और सौरभ को हिरासत में लेकर पांच दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया।
- 10 अक्टूबर को दिल्ली में पाबंदियां: 10 अक्टूबर के प्रदर्शन को रोकने के लिए दिल्ली में मेट्रो, रेलवे स्टेशन बंद किए गए और बाहर से भारी पुलिस बल तैनात किया गया।
प्रशांत भूषण ने उजागर की SIR की कानूनी खामियां
वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने चुनाव आयोग की प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए कहा कि मतदाता सूची के पुनरीक्षण में नियमों की धज्जियां उड़ाई गई हैं। कानून के अनुसार नाम जोड़ने या हटाने का अधिकार स्थानीय निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारी (ERO) के पास होता है, लेकिन आयोग ने दिल्ली में एक केंद्रीय आईटी सेल बनाकर सारा नियंत्रण अपने हाथ में ले लिया।
- ड्राफ्ट रोल से नाम गायब: दिल्ली में ड्राफ्ट रोल से करीब 47 लाख लोगों के नाम हटा दिए गए, जिनमें से 42 लाख को 'शिफ्टेड' बता दिया गया।
- लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी का मनमाना पैमाना: दिल्ली में करीब 19 लाख लोगों को लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी के नोटिस जारी किए गए, जिसमें बिना किसी ठोस आधार के खासकर अल्पसंख्यक मतदाताओं को निशाना बनाया गया।
- फॉर्म 6 की अनिवार्यता पर सवाल: शिफ्ट हुए मतदाताओं से जबरन फॉर्म 6 भरवाया जा रहा है, जिसमें यह झूठा हलफनामा देना पड़ता है कि उन्होंने पहले कभी मतदान नहीं किया।
'शांतिपूर्ण प्रदर्शन मौलिक अधिकार, यह लोकतंत्र बचाने की लड़ाई'
प्रशांत भूषण ने जोर देकर कहा कि सुप्रीम कोर्ट कई फैसलों में स्पष्ट कर चुका है कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन करना नागरिकों का मौलिक अधिकार है और सरकार मनमाने ढंग से किसी एक जगह को तय कर विरोध को दबा नहीं सकती। उन्होंने आरोप लगाया कि जहां शांतिपूर्ण युवाओं पर धारा 163 (पूर्व में धारा 144) लगाकर जेल भेजा जा रहा है, वहीं लाठी-डंडों से हमला करने वाले उपद्रवियों को तुरंत छोड़ दिया जाता है।
अंत में उन्होंने घोषणा की कि किसान संगठन, छात्र संगठन, ट्रेड यूनियन और सभी नागरिक अधिकार मंच एकजुट होकर चुनावी लोकतंत्र और संविधान को बचाने के लिए इस लड़ाई को आगे बढ़ाएंगे।


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