15 अगस्त के भाषण में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा 'दिमागी नक्सल' शब्द का इस्तेमाल किए जाने के बाद इस पर बहस छिड़ गई है। एक इंटरव्यू में जब इस शब्द के मायने पर सवाल पूछा गया, तो शायर ने इसका अपने ही अंदाज़ में जवाब दिया।
दिमागी नक्सल की क्या है परिभाषा?
शायर ने कहा कि 'दिमागी नक्सल' वह है जो नाइंसाफी के खिलाफ आवाज़ उठाए। इस परिभाषा के हिसाब से तो वे खुद भी 'दिमागी नक्सल' की श्रेणी में आते हैं और शायद कई अन्य लोग भी इसी दायरे में आएंगे।
राजनीति में नैरेटिव और हेडलाइन मैनेजमेंट
उन्होंने देश की राजनीति पर बात करते हुए गंभीर आरोप लगाए कि पिछले एक दशक से देश में दो मुख्य काम बहुत सलीके से किए जा रहे हैं:
- नैरेटिव बिल्डिंग का काम
- हेडलाइन मैनेजमेंट का काम
एक टीम नैरेटिव बनाती थी और दूसरी टीम किसी चूक की स्थिति में उससे बड़ी खबर जल्दी से बनवाकर हेडलाइन मैनेज करती थी। लेकिन अब इत्तेफाक से ये दोनों टीमें फेल हो चुकी हैं और नए रिक्रूटमेंट की बारी आ गई है।
बदलते सवाल और नई पीढ़ी का रवैया
पत्रकार ने बताया कि अयोध्या में हाल ही में एक नया वाकया सामने आया है कि अब किसी भी मीडियाकर्मी या यूट्यूबर को स्कूलों के अंदर जाने की इजाजत नहीं होगी। इस पर चर्चा करते हुए वक्ता ने कहा कि:
- अब सवाल आउट ऑफ द सिलेबस आ रहे हैं।
- जिस हिंदू-मुस्लिम के नाम पर लोग सत्ता के गलियारों तक पहुंचे थे, आज देश की नई पीढ़ी उन पुरानी बातों को सुनना नहीं चाहती।
- अब युवा स्कूल की छत टपकने, बच्चों की संख्या और शिक्षकों की कमी जैसे बुनियादी मुद्दों पर सवाल कर रहे हैं।
विकास के दावों और ज़मीनी हकीकत का फर्क
वक्ता ने कहा कि पहले जहां केवल डायलॉग डिलीवरी और हेडलाइन मैनेजमेंट से काम चल जाता था, अब वैसी स्थिति नहीं है। दिल्ली के एयर कंडीशन कमरों में बैठकर नैरेटिव नहीं बन सकता, क्योंकि अब लोग सड़कों पर उतरने लगे हैं, सड़कों के फोटो खींच रहे हैं और ज़मीनी हकीकत सामने ला रहे हैं।


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