लाल किले की प्राचीर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश को संबोधित किया। इस भाषण में विकसित भारत की बात हुई, युवा, ऊर्जा, तकनीक, सुरक्षा और आत्मनिर्भर भारत की बात हुई, लेकिन एक नाम गायब रहा—राम मंदिर। सवाल इसलिए बड़ा है क्योंकि राम मंदिर सिर्फ एक मंदिर नहीं, बल्कि पिछले कई वर्षों में बीजेपी की राजनीति और प्रधानमंत्री मोदी के सबसे बड़े सांस्कृतिक और राजनीतिक नैरेटिव का हिस्सा रहा है।
ठीक इसी वक्त अयोध्या के राम मंदिर में चढ़ावे को लेकर कथित गड़बड़ी और चोरी का मामला जांच के घेरे में है। तो सवाल है कि क्या लाल किले से राम मंदिर का नाम न लेना महज संयोग है, या फिर अयोध्या में चल रहे चढ़ावा विवाद के बीच प्रधानमंत्री ने जानबूझकर इस मुद्दे से दूरी बना ली है?
लाल किले के भाषण के मुख्य मुद्दे
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भाषण में कई बड़े और अहम मुद्दे शामिल रहे, जिनमें निम्नलिखित बिंदु प्रमुख थे:
- विकसित भारत और भारत की बढ़ती आर्थिक और तकनीकी ताकत
- ऊर्जा सुरक्षा, युवा, एआई (AI), सेमीकंडक्टर और राष्ट्रीय सुरक्षा
- विपक्ष पर भी निशाना साधना
लेकिन पूरे भाषण में राम मंदिर विवाद का कोई उल्लेख नहीं हुआ।
राम मंदिर और बीजेपी की राजनीतिक यात्रा
अयोध्या और राम मंदिर प्रधानमंत्री मोदी की राजनीतिक यात्रा के सबसे महत्वपूर्ण प्रतीकों में से एक रहे हैं। राम मंदिर निर्माण को लेकर बीजेपी ने लंबे समय तक आंदोलन चलाया है। प्रधानमंत्री मोदी ने खुद मंदिर निर्माण से जुड़े कई महत्वपूर्ण मौकों पर इसकी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्ता को रेखांकित किया है। 5 फरवरी 2020 को संसद में खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राम मंदिर ट्रस्ट की घोषणा की थी। लेकिन लाल किले से जब देश प्रधानमंत्री से राम मंदिर के विषय में कुछ सुनना चाह रहा था, तब प्रधानमंत्री इस मुद्दे पर खामोश रहे और राम मंदिर का नाम तक नहीं आया।
चढ़ावे और दान में कथित गड़बड़ी के मामले
राम मंदिर में श्रद्धालुओं द्वारा दिए गए चढ़ावे और दान में कथित गड़बड़ी और रकम के दुरुपयोग को लेकर मामला सामने आया।
- जांच के लिए एसआईटी (SIT) की टीम बनाई गई।
- मामला इतना गंभीर हुआ कि इसकी गूंज सुप्रीम कोर्ट तक जा पहुंची।
यानी मामला अभी खत्म नहीं हुआ है, जांच जारी है और अदालत में भी मामला विचाराधीन है। इसीलिए इसे सीधे तौर पर चोरी साबित हो गई कहना सही नहीं होगा, सही शब्द है 'कथित चोरी' या 'कथित गबन' और उसकी जांच।
विपक्ष और आम जनता के सवाल
राजनीतिक सवाल इससे खत्म नहीं होते क्योंकि विपक्ष और आम जनता लगातार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की चुप्पी पर सवाल उठा रहे हैं। सवाल यह है कि राम मंदिर जैसे संवेदनशील और राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण मुद्दे पर प्रधानमंत्री आखिर क्यों नहीं बोल रहे हैं? सीजेपी (CJP) का आंदोलन खत्म हुए अभी कुछ ही दिन बीते हैं, जिसमें शिक्षा मंत्री का इस्तीफा भी हुआ और इसी कड़ी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश के युवाओं के लिए आज कई बड़े ऐलान भी किए। लेकिन करोड़ों राम भक्तों की पीड़ा पर प्रधानमंत्री मरहम क्यों नहीं लगा पाए? यह एक महत्वपूर्ण सवाल है।
राम मंदिर पर चुप्पी का राजनीतिक संदेश
सवाल सिर्फ यह नहीं है कि पीएम मोदी ने राम मंदिर का नाम क्यों नहीं लिया। सवाल यह है कि जिस राम मंदिर को बीजेपी की राजनीति में इतना बड़ा राष्ट्रीय और सांस्कृतिक प्रतीक बनाया गया, उसी मंदिर के चढ़ावे को लेकर विवाद सामने आने पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तरफ से कोई सार्वजनिक टिप्पणी क्यों नहीं आई? इसकी टाइमिंग बेहद महत्वपूर्ण है, बेहद महत्वपूर्ण है। एक तरफ लाल किले से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का भाषण, तो दूसरी तरफ अयोध्या राम मंदिर चढ़ावा मामले की जांच, और तीसरी तरफ मामले में आगे बढ़ती न्यायिक प्रक्रिया। तो क्या इन घटनाओं को जोड़कर कोई राजनीतिक संदेश निकलता है?


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