बिहार की राजनीति में मुख्यमंत्री की कुर्सी, सरकारें और चेहरे बदलते रहे हैं, लेकिन कुछ पते इतिहास बन जाते हैं। ऐसा ही एक पता पटना का 10 सर्कुलर रोड था, जो करीब दो दशकों तक सिर्फ एक सरकारी बंगला नहीं, बल्कि लालू प्रसाद यादव और आरजेडी की राजनीति का सबसे मजबूत किला और अनौपचारिक मुख्यालय रहा था।
लेकिन अब वक्त बदल चुका है। उसी बंगले से सामान निकल रहा है, दीवारें खाली हो रही हैं, और राबड़ी देवी करीब दो दशक पुराना अपना यह पता छोड़ने की तैयारी कर चुकी हैं। सरकार का कहना है कि यह केवल सरकारी नियमों का पालन है और यह आवास अब नंद किशोर यादव को आवंटित किया जा चुका है, लेकिन इस खाली होने की टाइमिंग ने कई सियासी सवाल खड़े कर दिए हैं।
20 साल का एक मजबूत सियासी पता
पटना का 10 सर्कुलर रोड सिर्फ एक इमारत नहीं, बल्कि बिहार की सत्ता का सबसे बड़ा पावर सेंटर रहा है। इस पते की कुछ मुख्य विशेषताएं थीं:
- यहाँ से चुनाव लड़े गए और मुख्यमंत्री तय हुए।
- कई गठबंधन बने और बिगड़े, तथा बिहार की राजनीति की दिशा तय हुई।
- सुबह से रात तक नेताओं की गाड़ियों, ताँता लगाने वालों और टिकटार्थियों की लंबी लाइनें लगी रहती थीं।
- विधायक, सांसद और बड़े कारोबारी यहाँ हाजिरी लगाते थे क्योंकि यहाँ का फैसला पूरे बिहार में जस का तस माना जाता था।
आरजेडी के इतिहास का अहम अध्याय
1990 से 1997 तक जब लालू प्रसाद यादव मुख्यमंत्री थे, तब उनका आधिकारिक आवास एक अणे मार्ग था, 10 सर्कुलर रोड नहीं। लेकिन 1997 में राबड़ी देवी के मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्हें यह सरकारी आवास आवंटित किया गया, जिसके बाद से यह लालू परिवार की राजनीतिक पहचान का केंद्र बन गया।
इसी पते पर तेजस्वी यादव की राजनीति ने आकार लिया, राष्ट्रीय राजनीति के बड़े नेताओं का आना-जाना लगा रहा, और आरजेडी की تمام रणनीतियां यहीं रची गईं। मीडिया के कैमरे और राजनीतिक विश्लेषक हमेशा इसी गेट के बाहर टकटकी लगाए रहते थे ताकि बिहार की राजनीति की धड़कन समझी जा सके।
अब क्या हैं इस बदलाव के सियासी मायने?
बिहार सरकार ने यह स्पष्ट किया है कि आवास खाली करना एक सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया है, क्योंकि यह किसी की निजी संपत्ति नहीं होती और नियम सभी के लिए समान हैं। हालांकि, आरजेडी इसे महज़ प्रशासनिक कार्रवाई नहीं मानती बल्कि इसे एक बड़े राजनीतिक संदेश के रूप में देख रही है।
आगामी विधानसभा चुनाव से ठीक पहले इस आवास परिवर्तन को लेकर राजनीतिक गलियारों में तरह-तरह की चर्चाएं हैं। एक तरफ जहां सत्ता पक्ष इसे सामान्य आवंटਨ मान रहा है, वहीं दूसरी तरफ यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या किसी सरकारी बंगले के खाली होने से किसी बड़े नेता का राजनीतिक प्रभाव भी खत्म हो जाता है, और क्या आने वाले समय में बिहार की राजनीति का केंद्र कोई और पता बनेगा।


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