2,000 साल से अधिक पुरानी किताब 'मनुस्मृति' एक बार फिर 2026 की राजनीति के केंद्र में आ गई है। राहुल गांधी द्वारा महिलाओं की स्वतंत्रता और संपत्ति के अधिकारों को लेकर मनुस्मृति पर उठाए गए सवालों के बाद देश में राजनीतिक और धार्मिक घमासान शुरू हो गया है।
इसी विवाद के बीच ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती भी उतर आए हैं, जिन्होंने राहुल गांधी पर परंपरा और विरासत को बदनाम करने और मनुस्मृति की बातों को गलत तरीके से पेश करने का गंभीर आरोप लगाया है।
राहुल गांधी और मनुस्मृति पर उठे सवाल
कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने हाल ही में महिलाओं की स्वतंत्रता और अधिकारों के संदर्भ में मनुस्मृति पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि महिलाओं को किसी पिता, पति या बेटे की संपत्ति नहीं माना जाना चाहिए, बल्कि वे सबसे पहले खुद की मालिक हैं।
उनके इन बयानों के बाद भारतीय युवा कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने RSS मुख्यालय के बाहर प्रदर्शन किया और मनुस्मृति के पन्ने जलाए, जिसकी तुलना 25 दिसंबर 1927 को डॉ. भीमराव अंबेडकर द्वारा मनुस्मृति दहन से की जा रही है।
शंकराचार्य का पलटवार और मांग
ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने राहुल गांधी के बयानों की कड़ी आलोचना करते हुए उनसे माफी की मांग की है। उन्होंने चेतावनी दी है कि यदि राहुल गांधी माफी नहीं मांगते हैं, तो कांग्रेस के खिलाफ हिंदू बहिष्कार की मुहिम चलाई जा सकती है।
- शंकराचार्य का तर्क है कि मनुस्मृति में महिलाओं की 'रक्षा' (संरक्षण) की बात कही गई है, न कि उन्हें गुलाम बनाने की।
- उन्होंने कहा कि अगर मनुस्मृति के प्रावधानों को गलत बताया जा रहा है, तो फिर पिता या परिवार द्वारा बच्ची की रक्षा करने के कर्तव्य को भी कैसे नकारा जा सकता है।
- उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि क्या राहुल गांधी के बयान के बाद कांग्रेस पार्टी के नेताओं के यहां जन्म लेने वाली बच्चियों की रक्षा उनके पिता नहीं करेंगे।
मनुस्मृति का असली स्वरूप और इतिहास
विवाद के बीच यह जानना जरूरी है कि मनुस्मृति असल में क्या है और इसका इतिहास क्या कहता है:
- इसका प्राचीन नाम 'मानव धर्मशास्त्र' है, और इसमें कुल 12 अध्याय तथा लगभग 2,700 श्लोक हैं।
- यह कोई दो श्लोकों की किताब नहीं है, बल्कि इसमें परिवार, विवाह, संपत्ति, राजा के कर्तव्य, अपराध और सजा जैसी सामाजिक व्यवस्थाओं पर विस्तार से चर्चा की गई है।
- इतिहासकारों के अनुसार, मनुस्मृति का कोई एक मूल लेखक या निश्चित तारीख नहीं है, बल्कि यह प्राचीन भारतीय धर्मशास्त्रीय परंपरा का एक प्रभावशाली ग्रंथ है जिसे 1794 में सर विलियम जोन द्वारा अंग्रेजी में अनुवादित किया गया था।
महिला सम्मान और कठोर दंड के प्रावधान
मनुस्मृति में महिलाओं के सम्मान और अपराधों को लेकर विरोधाभासी बातें देखने को मिलती हैं, जो आज के समय में बहस का मुख्य कारण हैं:
- एक तरफ इसमें कहा गया है कि "जहां महिलाओं का सम्मान होता है, वहां देवता प्रसन्न होते हैं और जहां सम्मान नहीं होता, वहां किए गए धार्मिक कार्य भी सफल नहीं होते।"
- दूसरी तरफ, शूद्रों द्वारा ऊंचे वर्ण के व्यक्ति को अपशब्द कहने पर जीभ काटने जैसी कठोर सजाओं का उल्लेख भी मिलता है।
- आधुनिक बराबरी और स्वतंत्रता के विचारों के साथ इन सभी प्रावधानों को एक साथ स्वीकार करना आज के समाज के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है।
संविधान और मनुस्मृति की तुलना
आज भारत का सर्वोच्च कानूनी दस्तावेज देश का संविधान है, जिसके अनुच्छेद 14 (कानून के समक्ष समानता), अनुच्छेद 15 (भेदभाव का निषेध) और अनुच्छेद 17 (अस्पृश्यता की समाप्ति) आधुनिक मूल्यों पर आधारित हैं।
दिलचस्प बात यह है कि 1927 में जिस डॉ. अंबेडकर ने मनुस्मृति दहन का नेतृत्व किया था, वही आगे चलकर संविधान सभा की ड्राफ्टिंग कमेटी के अध्यक्ष बने, हालांकि संविधान किसी एक व्यक्ति की रचना नहीं बल्कि सामूहिक प्रयास था।


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