राम मंदिर के पक्ष में सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले के दिन से लेकर उसके उद्घाटन और उस दौरान उठे सवालों तक, पत्रकार शाजिया निसार ने अपने अनुभवों को साझा किया है। 9 नवंबर 2019 के उस दिन जब देश की सर्वोच्च अदालत ने राम मंदिर के पक्ष में फैसला सुनाया था, तब न्यूज़रूम का माहौल कैसा था और एक मुस्लिम पत्रकार होने के नाते उन्हें किन आलोचनाओं का सामना करना पड़ा, इस पर उन्होंने खुलकर बात की है।
9 नवंबर 2019: फैसले का दिन और सोशल मीडिया की प्रतिक्रिया
9 नवंबर 2019 को जब सुप्रीम कोर्ट का फैसला आया, तब पूरा देश खुशी से झूम रहा था और लोग अपनी सीटों से खड़े होकर जश्न मना रहे थे। उस समय रिपब्लिक भारत में न्यूज़ एंकर के तौर पर काम कर रहीं शाजिया ने सोशल मीडिया पर पोस्ट किया था कि आखिरकार भारतवासियों और राम भक्तों का वर्षों का इंतजार पूरा हुआ।
इस पोस्ट के बाद उन्हें भारी आलोचना और जजमेंट का सामना करना पड़ा, क्योंकि वह एक मुस्लिम थीं। लोगों ने सवाल उठाया कि एक मुसलमान होने के बावजूद वह राम मंदिर के फैसले पर इतनी खुश क्यों हैं और भारतवासियों को बधाई क्यों दे रही हैं।
राम मंदिर को लेकर लोगों का उत्साह और जुड़ाव
2019 में जब फैसला आया और जब मंदिर का उद्घाटन हुआ, तो जो लोग वहां पहुंच नहीं पाए थे, वे टीवी स्क्रीन के सामने बैठकर रामलला की पूजा-अर्चना कर रहे थे। 500 वर्षों का इंतजार खत्म होने के बाद सबको ऐसा लगा मानो रामलला अयोध्या वापस आ गए हैं और लोगों की आस्था चरम पर थी।
- फैसले के दिन लोग टीवी स्क्रीन के सामने बैठकर पूजा-अर्चना कर रहे थे।
- 500 वर्षों का लंबा इंतजार खत्म होने पर लोगों में भारी उत्साह था।
- लोगों की रामलला के प्रति गहरी आस्था और जुड़ाव देखने को मिला।
चंदा विवाद और राम भक्तों की पीड़ा
कुछ सालों बाद राम मंदिर के दरबार में सबसे बड़ी चोरी यानी चंदे की चोरी का मामला सामने आया, जिसे राम भक्त स्वीकार नहीं कर पा रहे थे। जब यह खबर आई कि रामलला के दरबार में भी चंदा चोरी हो सकता है, तो खुद उन पर भी विश्वास करना मुश्किल हो रहा था।
सिंधी समाज और कई अन्य लोगों ने अपनी गाढ़ी कमाई और कीमती सामान दान में दिए थे, लेकिन जब इस तरह की गड़बड़ियों की रिपोर्ट्स सामने आईं, तो लोगों की पीड़ा और दर्द और बढ़ गया।
अयोध्या यात्रा और संतों-कारसेवकों की खामोशी
जब उन्होंने सच्चाई जानने के लिए अयोध्या का दौरा किया, तो वहां का माहौल काफी अजीब और खामोश था। साधु-संत और जिन्होंने वर्षों से इस संघर्ष और कोर्ट की लड़ाई में अपनी अहम भूमिका निभाई थी, वे इस पर बात करने से बच रहे थे और ज़्यादातर खामोश थे।
- अयोध्या में साधु-संतों और कारसेवकों का माहौल खामोश और अजीब था।
- संतोष दुबे जैसे कारसेवकों ने अपनी पीड़ा और दुर्घटनाओं का ज़िक्र किया।
- उद्घाटन और ट्रस्ट के फैसलों में संघर्ष करने वालों को शामिल न किए जाने से लोगों में नाराज़गी थी।
राष्ट्रवादी पत्रकारिता और सच की तलाश
शाजिया निसार का मानना है कि राष्ट्रवादी पत्रकारिता करने में कोई गुरेज नहीं होना चाहिए और सबसे महत्वपूर्ण अपने राष्ट्र के प्रति ईमानदार होना है। दुनिया चाहे जो भी लांछन लगाए, वह हमेशा सच की तलाश में रहेंगी और जब भी राम मंदिर के चंदे और पूरी सच्चाई सामने आएगी, वह उसे जनता के सामने रखेंगी।


0 टिप्पणियाँ
अभी तक कोई टिप्पणी नहीं। सबसे पहले टिप्पणी करें।