अयोध्या राम मंदिर के निर्माण और उससे जुड़े इतिहास को लेकर समय-समय पर कई खुलासे और दावे सामने आते रहे हैं। हाल ही में एक इंटरव्यू में संतोष दुबे ने एक बड़ा दावा करते हुए कहा है कि राम मंदिर आंदोलन के दौरान प्राण-प्रतिष्ठित की गई हजारों रामशिलाओं में से कई शिलाएं रहस्यमयी तरीके से गायब हो गईं।
संतोष दुबे के अनुसार, इन गायब हुई रामशिलाओं में सोने, चांदी, हीरे और रत्नों से जड़ी अमूल्य शिलाएं भी शामिल थीं। इस पूरे मामले पर उन्होंने कई अहम खुलासे किए हैं और मंदिर निर्माण से पहले के हालातों पर चर्चा की है।
रामशिलाओं का इतिहास और गणना
संतोष दुबे ने बताया कि 1989 से 1990 के बीच चार महीने चले एक बड़े आंदोलन के दौरान देश-दुनिया से सवा करोड़ रामशिलाएं अयोध्या लाई गई थीं। इनमें से लगभग 1250 रामशिलाएं ऐसी थीं जो सोने, चांदी, हीरे और मणियों से जड़ी हुई थीं।
इनकी गणना करने वाली पांच प्रमुख हस्तियां थीं, जिनमें शामिल थे:
- परमहंस रामचंद्र दास जी (मुखिया)
- महंत रामबिलास वेदांती जी
- महंत विश्वनाथ दास शास्त्री जी
- संतोष दुबे स्वयं
- रामदयाल जी (संघ के प्रचारक)
इस पूरी सूची में से अब केवल संतोष दुबे ही जीवित बचे हैं, बाकी सभी सदस्य अब इस दुनिया में नहीं हैं।
करोड़ों की कीमत वाली रामशिला
साक्षात्कार में बताया गया कि इन रामशिलाओं में एक रामशिला मॉरीशस से आई थी, जिसकी कीमत उस समय लगभग 11 करोड़ रुपये आंकी गई थी। इसके अलावा मुंबई के एक कारोबारी द्वारा भेंट की गई साढ़े तीन किलो की हीरा-रत्नों जड़ी रामशिला भी शामिल थी, जिसकी कीमत का कोई अनुमान नहीं लगा पाया।
2002 में रहस्यमयी गायब होने की घटना
दावे के मुताबिक, यह सारी रामशिलाएं वर्ष 2002 तक सुरक्षित थीं, जब चंपत राय बंसल इस पूरे मामले के संरक्षक और देखरेख करने वाले थे। उस समय ये शिलाएं तीन तालों और तीन दरवाजों के अंदर रखी हुई थीं, लेकिन न तो ताला टूटा और न ही दरवाजा, फिर भी वे गायब हो गईं।
कुंभ मेले में श्रद्धालुओं के आंकड़े
बातचीत के दौरान कुंभ मेले में आए श्रद्धालुओं का जिक्र करते हुए यह तर्क दिया गया कि यदि इतने बड़े पैमाने पर लोग छोटे योगदान भी दें, तो चंद महीनों में हजारों-करोड़ों की राशि जुट सकती है। इसी आधार पर राम मंदिर आंदोलन और दान से जुड़े वित्तीय पहलुओं पर भी सवाल उठाए गए हैं।


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